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नई दुनिया बसाने के चक्कर में, वो दुनिया छोड़ आए हैं

नई दुनिया बसाने के चक्कर में, वो दुनिया छोड़ आए हैं
तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं।

सभी त्योहार मिलजुल कर मनाते थे वहाँ जब थे
नई दुनिया बसा लेने की इक कमज़ोर चाहत में,
दिवाली छोड़ आए हैं दशहरा छोड़ आए हैं।

गुजरते वक़्त बाज़ारों के अब भी याद आता है,
पुराने घर की दहलीज़ों को सूना छोड़ आए हैं ।
पटाखों की वो लड़ियाँ माचिस की तिल्ली छोड़ आए हैं।

भाई की कलाई पर बहना ने जो एक डोर बांधा था,
वो राखी छोड़ आए हैं वो रिश्ता छोड़ आए हैं।

पकाकर रोटियाँ रखती थी माँ जिसमें सलीक़े से,
घर से निकलते वक़्त वो रोटी की डलिया छोड़ आए हैं ।

यक़ीं आता नहीं, लगता है कच्ची नींद में हूँ शायद,
की घर की शाम गावं का सवेरा क्यू छोड़ आए हैं ।

कहानी का ये हिस्सा आजतक सब से छुपाया हमने,
कि एक रोटी की ख़ातिर सबकुछ छोड़ आए हैं।
नई दुनिया बसाने के चक्कर में, वो दुनिया छोड़ आए हैं।

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